कुछ ऐसे था पूछा उसने…
बंद करो अब खेल बिँदौरी, हो गया बहुत तमाशा... कण कण से मै वाकिफ हूँ, ना दो तुम मुझे धिलासा... इंसानो की इस दुनिया से, आ लौट चले अपने घर को... रिस्ते नाते झूँठे प्रियतम सब हैँ एक तमाशा... नितदिन नाचोगे रंग मंच मेँ, कठ पुतली सा तकधिन.... उम्र बीत जाएगी यूँही, जाना ही है एक दिन... सब की आँख मेँ देख रहे हैँ , अपनी आँख का सपना... कोई नहीँ है प्रियतम अपना, तुम को यूँहीँ तपना... छोड दो! मोह माया का बंधन, उल्झन अपने मन की... आओ हो जाओ संग मेरे, मैँ लैला हर जीवन की....