बिन पते का सफ़र ... जिंदगी
ये सफ़र अब बिन पते का है। यहाँ किसी का कोई वाजिब घर नहीं जहाँ रात वहीँ बसेरा सुबह फिर सफ़र..... अगर आना तो रास्तों से मुसाफिर के पग पहचान लेना .... जंगल के पेड़ो से खुसबू पूंछ लेना.... ...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है