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जून, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बिन पते का सफ़र ... जिंदगी

ये सफ़र अब  बिन पते का है। यहाँ किसी का कोई वाजिब घर नहीं जहाँ रात वहीँ बसेरा सुबह फिर सफ़र..... अगर आना तो  रास्तों से मुसाफिर के पग  पहचान लेना .... जंगल के पेड़ो से खुसबू  पूंछ लेना.... ...

भारत का भविष्य...

दरवाजे से घुसता चला आ रहा था भविष्य ... मेरे भारत का कुछ भूत में बनी पोथीयों का बोझ लादे.... निर्भीक... निःसंशय ... जैसे...रवि/ पूरब से अंधकार को धकेलता चला आ रहा हो... मुश्कुरता... खिलखिलात...

जिंदगी बहना चाहती है

मोन रह के क्या कहना चाहती है। जिंदगी फिर बहना चाहती है।। सर पटक पत्थरों पर , करती है विलाप मुस्कुरा कर गम सहना चाहती है। आज कुछ जो ठहराव है इसकी गति में लगा दो आब में छहरना चाह...

बेबश इमान

ईमानदारी कही न कही हर बार हार कर... अकेले में मुझसे  बस सुगबुगाते बात करती है ... और मन ही मन  बड़ी पंडित बन इमान को दरिद्रा स्थित पर दुद्कारती है.... ईमान  अपनी परिस्थित को चुप चाप ...

लडखडा कर आज भी गिरते रहे..

लड खड़ा कर जोआज भी  हम गिरते रहे सच तो ये है हम फलक के तारे गिनते रहे टांक की टूटी कटोरी के घाव जो अब भी हरे मंदिर की सीढियाँ हम टांक के बल चढते रहे मन्नते मांगी बहुत तोड़े बहुत से ...

हु बा हु

वेदनाओं से जो लिपटी याद मुड़ आई इधर... .बिलकुल साफ थी तस्वीर तेरी.. .बादलों की धुंध पर.... देखती थी बिना झपके.... एक टक निगाहे गौर से... हाँ वही हु-बा-हु चेहरा.. दिख रहा इस दौर पर.... बह रहे दो धा...

जुगनू

ये जो जलते बुझते जुगनू है... दिलासा देते हैं ... ह्रदय को.. और... ताल ठोकते है अन्धेरेको .. कहते है.. हमारा सूरज दुबा है  ।हम नहीं.. हम तेरे सामंती राज में भी.. जलते बुझते जिन्दा रहेगे... तब त...