बिन पते का सफ़र ... जिंदगी

ये सफ़र अब  बिन पते का है।
यहाँ किसी का कोई वाजिब घर नहीं
जहाँ रात वहीँ बसेरा
सुबह फिर
सफ़र.....

अगर आना
तो 
रास्तों से
मुसाफिर के पग 
पहचान लेना ....

जंगल के पेड़ो से
खुसबू  पूंछ लेना....

और
पत्थरों से पथ....
नदियों से गति...
हवा से स्थित .....

एक दिन
पहुच जाओगे
तुम भी
उसी मुकाम पर

जहाँ का
कोई पता नहीं होता....

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