एक असंतुलित इंसान हूँ
मैं एक असन्तुलित बिचार रखने वाला मानसिक उथल पुथल में पलता सामाजिक एक इंसान हूँ..... वही हड्डी वही खाल से ढका पंच तत्व निर्मित उन्ही ज्ञानेंद्रियों कर्मेन्द्रियों में चलि...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है