घर के सपनें सजों अधभरा ठीक हूँ..गजल
बह्र-212-212-212-212 घर पे अपने बुरा या भला ठीक हूँ।। गुम शु दा हूँ अगर गुम शु दा ठीक हूँ।। पर्त धू की चढ़ी,दीमकों का बसर। हो लगी चाहे सीलन पता ठीक हूँ।। मेरा लहजा है कोई कहे न कहे। मैं रदीफ़ ...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है