देखिएगा एक दिन तश्वीर और ये घाव मेरे
वक्त की जकड़ी हुई जंजीर और ये घाव मेरे ।। देखिएगा एक दिन तस्वीर और ये घाव मेरे ।। त्याग मेरा ओर समर्पण जिंदगी के पथ में चल कर । पाएगा तू इक अलग ताशीर और ये घाव मेरे ।। कितना सच कितना हुं झूठा मैने कितने रब लिखे हैं। जिंदगी की दौड़ में ये पीर और ये घाव मेरे।। आदमी को आदमी में खोज पाना हो कठिन और । पथ के’ कांटों से सजी तकदीर और ये घाव मेरे ।। मुश्किलों से खीझता मन हो लहू लुहान आंखें। हो कभी बे–वक्त बहता नीर और ये घाव मेरे। फिर कभी गुल्लक से निकली कोई मेरी’याद जैसे । मुफलिसी में भी छिपी जागीर और ये घाव मेरे ।। जिंदगी लेकर है आई आखिरश मुदीर–सफ्हे*। लेखकीय पन्ने जैसे कोई कर रहा तश्कीर और ये घाव मेरे ।। फिर चलूंगा मैं नया पथ फिर करेगी’ जिंदगी बल। शाख हों’गी’ जुल्फ ए गिरह तामीर और ये घाव मेरे।। मनमशोसे जल रही हो आंत की चिंगारियां तुम एक प्याला हो अता तकदीर और ये घाव मेरे।। आमोद बिंदौरी / मौलिक