बुढ़ापा बचपन ही तो है...
अब तू बच्ची हो जो कहु वही सुना कर बच्चों की तरह जहाँ बैठाऊ वही बैठा कर जहाँ लेताऊ वहीँ लेता कर सा समय खाना खाया कर सा समय सोया कर जादा मेहनत न करा कर अब मै तुमसे सयाना हु कर लूँ...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है