उसने रोका था......

पुरजोर सफ़र रोकती थी ,
मेरे प्यार में  खडी होकर
कहती थी न जाओ न जाओ ,
मेरे सामने खड़ी होकर....

बे-सुध थी हालात से ,
मुझसे लिपटी थी इस कदर
आँखे भी डबडबाई थी ,
सूखा में लड़ी होकर....

दुपट्टे का बहाना था ,
चेहरा छिपा रही थी
लडखडा रही थी वो ,
मजबूत  छड़ी होकर....

यह प्यार भी आगोश में ,
एक आग जला रहा था
वो मदहोश सुलग रही थी ,
भट्टी में खड़ी होकर....

सफ़र में पत्थर होकर,
जब बढ गया था मै
चुप चाप लगीथी वो ,
दरवाजे की कड़ी होकर  ....

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