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बातों'- बातों सवाल आया कुछ।।

2122-1212-22 बातों'- बातों सवाल आया कुछ।। हिज्ज्र जैसा विसाल आया कुछ।। उस गली का खयाल आया कुछ।। मुश्क आई मलाल आया कुछ।। कितना दो रंग हो गया हूँ अब । आंख में भर निकाल आया कुछ।। भूल जाते हैं लोग खुद को ही। रुतबे' में जो उछाल आया कुछ।। मैंने' उनको भुला दिया उस-दिन । जबसे  लहजे में चाल आया कुछ।। रास्तों की कहानियाँ बिल्कुल। वैसी' सुहबत में डाल आया कुछ।। लोग कहते हैं कीमती था वो। मैं तो क़ीमत निकाल आया कुछ।। देख वीरान टूटी' ये कश्ती । खून में यूँ उबाल आया कुछ।। रौनक़- ए- कारोबार है ओझल। मुश्किलें भर ये साल आया कुछ।। आमोद बिंदौरी / मौलिक -अप्रकाशित

हमने नही ख़रीद रख्खा है कोई ग़म

221-2121-221-212 फूलों के बाग में हैं काँटों के साथ हम।। हमने नहीं ख़रीद रख्खा है कोई ग़म ।। खींचा कभी नही जी खिंच जाएगा मगर । ये दर्द चल रहा है ले यादें' हम कदम।। अखबार हो गए हैं किस्से वो प्यार के । रहने दो मोहतरम अभी ज़ेहनी दफ़न शरम।। जैसी चली हवाएं  वैसे बिख़र गये। कुचले कदम कोई भी फूलों को क्या "गुलम" ।।  ( दर्द ,जखम , injury) रखना ये फासला युं आना न पास  फिर । रोपोगे फ़स्ल फिर युं काटेंगे हम सनम ।। गर बे वफ़ा कहें तो है बात क्या बुरी?? अच्छा कहाँ लिखेगी' टूटी हुई क़लम।।   पत्थर को थोक कर  तमाशा नही किया। छैनी भी भाव भर के' देती नया जनम।। आमोद बिंदौरी / मौलिक 

नदियों से सीख रख्खा है बहने का इक हुनर

फूलों के साथ हों या काँटों के साथ हम।। जैसे भी हो जहां भी कुछ ढल गए युं ग़म।। क्या साथ जायेगा कभी सोंचता हुँ जो। क्यों पाल के रखा है इतने  ये सब भरम।। समझो इसे न खेल ग़र लग गया है दिल ! कितना भी कुछ भी कर ले होंगे नए सितम।। ओह्दे चराग़ जैसा रखता हुँ अब ज़िगर। सर पाए न उठा हवा या तले का तम।। नदियों से सीख रख्खा है बहने का' इक हुनर। इनको न कोई हर्ष इनकी न आँख नम।। आमोद बिंदौरी