हमने नही ख़रीद रख्खा है कोई ग़म
221-2121-221-212
फूलों के बाग में हैं काँटों के साथ हम।।
हमने नहीं ख़रीद रख्खा है कोई ग़म ।।
खींचा कभी नही जी खिंच जाएगा मगर ।
ये दर्द चल रहा है ले यादें' हम कदम।।
अखबार हो गए हैं किस्से वो प्यार के ।
रहने दो मोहतरम अभी ज़ेहनी दफ़न शरम।।
जैसी चली हवाएं वैसे बिख़र गये।
कुचले कदम कोई भी फूलों को क्या "गुलम" ।।
( दर्द ,जखम , injury)
रखना ये फासला युं आना न पास फिर ।
रोपोगे फ़स्ल फिर युं काटेंगे हम सनम ।।
गर बे वफ़ा कहें तो है बात क्या बुरी??
अच्छा कहाँ लिखेगी' टूटी हुई क़लम।।
पत्थर को थोक कर तमाशा नही किया।
छैनी भी भाव भर के' देती नया जनम।।
आमोद बिंदौरी / मौलिक
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