बहर :-1212-1122-1212-22 गरीब वो हैं कि जिनका मकां नहीं मिलता।। अमीर वो जो कभी खामखां नहीं मिलता।। कोई भी शख़्स मुझे खुश नुमां नहीं मिलता।। मुझे तो दर्द भी हँस कर मियां नहीं मिलता।। मैं ढूंढता हूँ तो खुद का निशाँ नहीं मिलता।। शह्र में तेरे मिरा हम जुबाँ नहीं मिलता।। मिले बहुत से मगर और बात है तुम में।। तुम्हारे जैसा कोई खुशनुमां नहीं मिलता।। कसम भी प्यार में खाई कसम को तोड़ा भी। हाँ यार तुम सा कोई बागवां नहीं मिलता।। समय के फेर में उलझा है आदमी कुछ यूँ। हमें जहाँ है जरुरत वहाँ नही मिलता।। जहाँ पे सिख - इसाई ,न हिन्दू - मुस्लिम हो।। मैं ढूढ़ता हूँ जिसे ,कारवाँ नहीं मिलता।। है आलिशान मकानों की त्रिश्नगी जैसा । मगर मिला जो मुझे ,प्यार हाँ नहीं मिलता।। जो शख्स मेरी मुहब्बत की इक इबादत है। वो अब मुझे ही मेरे दरमियाँ नही मिलता।। मुझे न रात की तन्हाई मार पाती यूँ। जो कमरा मेरा मुझे बेजुबाँ नहीं मिलता।। कोई हो शर्त मुहबत की मान लेंगे वो। जिन्हें ये इश्क उमर भर मियां नहीं मिलता।। उन्हें गजल से मेरी आज भी शिकायत है। की शेर इश्क ...