अब समझ नहीं आ रही बेरुख़ी

बह्र -212-212-212-212

मैने कह तो दिया जिंदगी आपकी।।
अब समझ में नहीं आ रही बेरुख़ी ।।

धड़कनें दिल की अपने जवां गिन कहो।
क्या  बदलती न  मेरे लिए आज भी।।।

आप समझें मुझे गर खिलौना न गम।
मुझको स्वीकार है ना समझ आशिक़ी।।

प्यार अहसास जुल्मों सितम रख लिए।
आगे चलकर मिले न मिले यह सभी।।

जिसकी रग में मुहब्बत की स्याही बहे।
वो कलम क्या बगावत लिखेगी कभी।।

कितना छांटो या काटो या मोड़ो इसे।
असलियत है न ये रंग बदलती कभी।।

हाल अब प्यार का आप मत पूछिए।
ये भी वैसा ही है जैसा की आदमी।।

आमोद बिंदौरी/ मौलिक अप्रकाशित

बाप कहता मेरी सब ये औलाद हैं।
खींच दीवार  बेटे रहे मजहबी।।

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