क्या कहेंगे लोग आखिर
बह्र:-2122-2122-2122-212 क्या कहेगे लोग आखिर मेरी गजलें देखकर। मैं किसानों की तरह ही खुश हुँ फसलें देखकर।। जिनके घर छप्पर पड़े हैं आदमी क्या वो नहीं। रो रहे है कुछ अमीराँ अपनी नस्लें देखकर...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है