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प्रेम ...दोहा प्रयास

दोहा बंधन में मत बांधिए ,हर रिश्ते को यार। प्रेम कभी होता नहीं बंधन से स्वीकार । नतमस्तक हो जाएगा यदि होगा स्नेह । बहता खून है संग से जैसे जीवित देह । तुझसे सब कुछ बोल के ,बैठा हूं चुप चाप।। सुननी है अब बस मुझे पैरों की पद चाप।। कितना मुझसे नेह है,और कितना विश्वास। आती जाती सांस में अब भी है कुछ आस । आमोद बिंदौरी 04/08/25

अपने दुख को स्वयं निमंत्रण देता हूं

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अपने दुख को स्वयं निमंत्रण देता हूं। मै पथ को फिर शूल आमंत्रण देता हूं। पीड़ाओं की पुनरावृतियां होने से विपदाओं की आवृत्तियां होने से साहस, धैर्य की खुद ही परीक्षा लेता हूं। अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं ...1 कमसिन आंखों वाली गोरी से हो जाए फिर इश्क अफीमी छोरी से मुझमें हो वो मादक महुए के जैसी फिर बिरहा मझधारों ,नइया खेता हूं  अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...2 दोस्त–दोस्त का खेल नहीं अच्छा होता  दोस्त हो दुश्मन खेल वही अच्छा होता  सारे अपने राज खुला कर देता हूं। अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...3 मुझको अति विश्वास मेरे संघर्षों पर छैनी के सिर चोंट किए हथौड़ों पर  मै उसको फिर पूर्ण स्वतंत्रता देता हूं अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...4 आमोद बिंदौरी 

सरल है जब ये कहूं ..प्रेम है

सरल है जब ये कहूं कि प्रेम है किंतु आध्यात्मिक ओ लौकिक प्रेम है ... मत बनो तुम रुक्मिणी,मेरे लिए  हृदयायनी शक्ति और पथ संगनी कृष्ण और राधा के जैसी शाश्वत  तुम्हारा प्रतिनिधित्व हो.... बस ये वचन दो... प्रेम ,कोमलता ओ करुणा साथ ले भाव हो पावन ओ भक्ति से भरा  ना चलो तो ना चलो कोई बात ना   हृदयके साम्राज्य की देवी हो ...बस ये वचन लो.. आमोद बिंदौरी 25/07/25

तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे

सांस की जब सरगम बदले  और आंख बिना मतलब रो ले हम दोनों की बात हो जाए  बिन चमड़े की जुबां डोले   तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–1 नंगे पैरों तपती धरती  का पथ शीतल नम्र लगे  हाथ अगर हो हाथों में तो सागर पर्वत क्षम्य लगे  तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–2  विपदाएं आएं जीवन में रच कर के कितने ही रंग  कहां अकेले भिड़े पड़े हो जब तुम बोलो बैठो संग  …तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–3 पारिवारिक परिचय यदि हो तो नाम तुम्हारे बाद आए सांसारिक जीवन की गति में सदा तुम्हारी याद आए …तब मानूंगा …प्रेम है तुमसे–4 कहने को ,कुछ भी कह दूं अंतिम निष्कर्ष तुम्हारा हो संकल्प कोई करने बैठूं यदि तेरे हाथ जल धारा हो  …तब मानूंगा …प्रेम है तुमसे –5 आमोद बिंदौरी 21/07/25

मिट्टी से नाता ...क्या बोलूं

मिट्टी से नाता क्या बोलूं  यह देख ..बदन से लिपट गई  अरु की किरणों संग मणियों सा  यह चमक रही है। दमक रही  चंदन सा शीतल तन करती खुशबू इसकी मन मोहक है  इस पर लेटू तो ममता सी। इसको चूमू तो पुत्री सी। माथे को छू ले तो है श्रृंगार  छाती से लगे तो भार्या सी कैसा अदभुद आनंद मई  संग इसके मेरा जीवन है । मिट्टी से नाता क्या बोलूं यह देख बदन से लिपट गई दाने दाने से अडिग प्रेम  जो इसमें मिला, संरक्षित है गीली हो  तो यह रूप गढ़े  यदि सूखे तो यह आश्रय है  यदि जनने में आ जाए तो माणिक,हीरे, सब बच्चे हैं  लाचार और गरीबों से  बड़े बड़े रणधीरों तक  ममता मई इस मिट्टी ने  सबको अपने से मिला लिया  मिट्टी से नाता क्या बोलूं  यह देख ...बदन से लिपट गई अरु की किरणों संग मणियों सा  यह चमक रही है ..दमक रही  आमोद बिंदौरी

हर सुलझाना है रस्सी की गांठें हमें तो

गर सुलझाना है रस्सी की गांठें हमें.तो.. खुल के दूर तक जाना पड़ेगा  कभी इस छल्ले को,  कभी उस छल्ले को सर झुका के भी  रिश्ता निभाना पड़ेगा  सामान्य सा एक पथ है सभी का  न छोटा है कोई,न कोई बड़ा है पिता की अहमियत भले कितनी हो पर इस संसार में मां का ओहदा बड़ा है। एक ग्रहणी बनोगे तो जानोगे यह भी  मक़ान और घर में बड़ा अंतरा है इमारत तो कोई भी बना लूं बड़ी सी मगर बिन तुम्हारे वो खंडर म काँ है तुम्ही हौसला हो , बुलंदी हो या गर्दिश भले तीर हूं पर  हो मेरे तुम तो तार्किस  मै छत हूं तो सुन्दर दीवारें तुम्ही हो  मकां हूं तो कुण्डी किवाड़े तुम्ही हो कभी खुद के ओहदे को कम मत समझना भले तुमसे आगे चलूं या की संग में मेरी सांस में पहला हक है तुम्हारा मेरी जिंदगी के भी मालिक तुम्हीं हो  मेरी जेब के चंद सिक्के या दौलत मेरे माथे का तेज ,चेहरे की रंगत भले मेरा दुश्मन हो सारा जमाना  मुझे खुद की नजरों से मत तुम गिराना मेरे खाली हाथों के संकल्प जल सी मेरे माथे में हो तिलक या की सुर्खी  मै पूजा करूं बिन तुम्हारे तो अधूरी बहुत ही बृहत हो है असंभव लिख पाना...

मां ....तुम अनमोल हो

थूक से पल्लू गीला कर  मेरे रूखे रुखसार को पोछा किया और फिर उसी कोने से  मेरे होठों को रसीला किया  मेरे माथे में एक कोना ढूंढा  अपनी आंख के कोने से  काजल उधार लिया  और मेरे माथे में टीका किया  उंगलियों ने उनकी ,कंघी की तरह मेरे उलझे उलझे बालों को सीधा किया  फिर उनकी ठहराई हथेली ने कंधा दबाया, बाजू दबाई  मेरे सीने को को सहलाते हुए  मेरी पैंट जो इलास्टिक की थी उसे घूमते हुए फिट किया  मेरे नन्हे से पैरों की उंगलियां और तलवे को दबाते सहलाते  नन्ही सी चप्पल पहनाई  और खड़ा कर के बोली  मेरे राजा बेटा ....तैयार हो गया  मां मै कई जन्मों में तेरे प्यार का  मोल नहीं भर सकता ..तुम अनमोल हो आमोद बिंदौरी