गर सुलझाना है रस्सी की गांठें हमें.तो.. खुल के दूर तक जाना पड़ेगा कभी इस छल्ले को, कभी उस छल्ले को सर झुका के भी रिश्ता निभाना पड़ेगा सामान्य सा एक पथ है सभी का न छोटा है कोई,न कोई बड़ा है पिता की अहमियत भले कितनी हो पर इस संसार में मां का ओहदा बड़ा है। एक ग्रहणी बनोगे तो जानोगे यह भी मक़ान और घर में बड़ा अंतरा है इमारत तो कोई भी बना लूं बड़ी सी मगर बिन तुम्हारे वो खंडर म काँ है तुम्ही हौसला हो , बुलंदी हो या गर्दिश भले तीर हूं पर हो मेरे तुम तो तार्किस मै छत हूं तो सुन्दर दीवारें तुम्ही हो मकां हूं तो कुण्डी किवाड़े तुम्ही हो कभी खुद के ओहदे को कम मत समझना भले तुमसे आगे चलूं या की संग में मेरी सांस में पहला हक है तुम्हारा मेरी जिंदगी के भी मालिक तुम्हीं हो मेरी जेब के चंद सिक्के या दौलत मेरे माथे का तेज ,चेहरे की रंगत भले मेरा दुश्मन हो सारा जमाना मुझे खुद की नजरों से मत तुम गिराना मेरे खाली हाथों के संकल्प जल सी मेरे माथे में हो तिलक या की सुर्खी मै पूजा करूं बिन तुम्हारे तो अधूरी बहुत ही बृहत हो है असंभव लिख पाना...