असम में स्वयं का अनुभव
पूर्व की ओर से सूर्य की स्वर्ण किरने पहाड़ों को चोटियों को स्वर्ण मुकुट से सजा रहीं है । बादलों की छटा घाटी में उतराई है। मैं हूं , और कल कल के संगीत के साथ झरने हैं। मंद हवा ठंडी ठंडी तन से टकरा कर सुरसुरी पैदा करती है टेढ़े मेढे रास्ते और उन से दिखाई देने वाले नज़ारे कुछ स्वादिष्ट मीठे रसीले फल झरने का शीतल मीठा जल कुछ नए पक्षियों के गीत अनजाने अनसुने से पतंगे, तितलियां , मधु इकट्ठा करती फूलो पर बैठी मधुमक्खियां जैसे सब को सुबह सुबह काम में लगा दिया गया हो शाम को लौटते पक्षियों का झुंड चौपाल पर बैठता हो जैसे .... चे चे के कोलाहल के साथ. .ढेर सारी बाते करता हुआ रात में चांद की शीतल रौशनी दूर गिर रहे झरने को साफ साफ आवाज जैसे पहाड़ कुछ कह रहे हो...! कुछ पुछ रहे हो ... रहने वाले बासिंदों से ... सुबह के निकले ..सब लौट आए न ? किसी बहेलिए , दुराचारी ने कुछ सदस्यों का शिकार तो नहीं किया ? ये जीवन का कानून है सब पर लागू है यही जीवन संघर्ष है .....#जीवन_संघर्ष आमोद बिंदौरी ©®