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अप्रैल, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कागज़ पर

मन की बात लिखा करो कागज़ पर तुम पुन: वो याद लिखा करो कागज़ पर तू जो भूले तो सहारा ले लिया कर मेरा आँखों का बारिश का भीगता तन चेहरे पर ख़ामोश उल्झन हडबडाते कदम लिखा कर कागज़ पर… आमोद...
धूप तेज होती जा रही है ज़मीन तपती  सी महसूस होती है अब क्या सावन भी सुखा गुज़र जाएगा इस मास मे गाँव के पेढो पर झूले हुआ करते थे गाँवकी सुन्दर सुन्दर सी गोरियाँ रहटाँ और झूले पर ...

सायरी 2

आज पतवार तेरे हाथ है तू खुद समझ ले बहाव मे बहेगा या बहाव से दो चार करेगा… आमोद बिंदौरी

न बेटा अपने घर का,न बहुऐ अपने घर की

बिस्मित होती जाती है, चमचमाते दाँतो की खिड़की अब घर नहीँ आती, बहुए अपने घर की… बहुए अपने घर की, सास बनी अब घर की आगाज मचाती है, नित ख़ुशियों से लड़ती … अब बहुओं को देते देखा है , आसिर...

मंजर देखने…

मंजर देखने आए हो देख लो एक तरफ़ … से दिल की दवा ले लेना … कुछ छोड़ना नहीँ … तुम्हारा ऐसा सस्र हुआ  तो कौन सभालेगा मज़ाक लग रहा था ना ये खेल … तुम तो अट्टहास कर रहे थे अब क्या हुआ¿¿¿¿ ...

सेहरा…

आज सेहरा पहना है इससे बड़ा और क्या इन्तेहान दूँ कुछ पल बाद कसमे भी खा लूँगा तेरी खाली माँग भी सारे समाज के सामने भर दूँगा शायद हाथ की लकीरे यही चाहती है खुदा ने वही अपना रिस्त...

होड …

मैतो रोज़ फेरे लेता हूँ … कोई साथ नहीँ बात और है सुबह का शुरू फेरा साझ खत्म होता है मुसाफिर तो खूब मिलते है पूरा दिन पर रात ……होती है जब से ये सासे चली… येधडकन धडकी… ये  आँखे खु...

सायरी

तू मंदिर वाली हो या गुरूद्वारे वाली चाहे अज़ान कर चाहे प्रार्थना… मुझे कोई फर्क नही मैं बस तुमसे प्यार करता हूँ…

अजब सपना…(हास्य )

आज आप लोगो की इजाज़त हो तो कहे कुछ चटपटी हास्य रचना होजाए पहली बार लिखी है तो… आलोचना ज़रूर करिए गा पेश है… आज रात देखा अजब सा सपना मित्रों बिल्कुल थी दुर्घटना घर मे बीबी ख़ास ब...

कुछ ऐसे था पुछा उसने -2

वाकिफ है तू कण कण से मैभी तो वाकिफ हो जाऊँ यदि पूछे मुझसे मालिक मेरा उसके जवाब को दे पाऊँ रिस्तो का मुझको क्या लेना मैं खुद उनकी ही कडियाँ हूँ आज नहीँ लैला कल लौटूँगा उल्टा ग...

रिस्ते …

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नकाब तक तो ठीक था रिस्ता … आदाब तक तो ठीक था एक दिन गढी की दीवारे ढह गयी मिल गई उनसे नज़र रु-ब-रु होकर… यही वो करबला था जो कर गया घर… आमोद बिंदौरी 18/04/2015

मेरे घर की मछलियाँ…

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ये नन्ही कलियाँ ही ,हर दम गुलशन को सजाती हैं यही वो तोतली वोली है जो कोयल से बतियाती हैं जिस घर भी ये जाती हैं, वहाँ ममता जन्म ही पाती है ये मछली मेरे आँगन की, कितनी ख़ुशियाँ ले आ...

लौटते कदम

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लौटते कदम … ………………………………………………………………… धुधले होते जा रहे हैं रिस्ते और सपनें जब कभी लौटा ?तो पाऊँगा सायद! न कभी… तूने सही कहा था । लौट आओ… बहारे यही हैं। वो क्या था …¿¿ जो खीच...

कोई कहानी लिखता तो क्या लिखता उनके हुस्न पे अपनी भी जबानी लिखता तो क्या लिखता उनके हुस्न पे कुछ कहू तो क्या कहूँ बस इतना समझ लो जितना भी लिखता जो भी लिखता पुराना लिखता उनके हुस्न पे आमोद बिँदौर

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कोई कहानी लिखता तो क्या लिखता उनके हुस्न पे अपनी भी जबानी लिखता तो क्या लिखता उनके हुस्न पे कुछ कहू तो क्या कहूँ बस इतना समझ लो जितना भी लिखता जो भी लिखता पुराना लिखता उनके ...

एक सुबह

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कभी कभी पूरी रात उलझन मेँ गुजर जाती है! जब नीँद आती है तो सूरज की किरण जगाती है जिँदगी...वक्त की दौड मेँ खडा कर जाती है कम्बक्त ... ना कोई दातून लाती है ना मुह धुलाती है आखिर! खाली पेट जिँदगी निवाले की तलाश मेँ लग जाती है आमोद बिँदौरी 11.12.2013