रिस्ते …

नकाब तक तो ठीक था
रिस्ता …
आदाब तक तो ठीक था
एक दिन
गढी की दीवारे ढह गयी
मिल गई उनसे नज़र
रु-ब-रु होकर…
यही वो करबला था
जो कर गया घर…
आमोद बिंदौरी 18/04/2015

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीवन पथ पर संशय गढ़कर ,स्वीकार नहीं तुम मुझको प्रिए

अपने दुख को स्वयं निमंत्रण देता हूं

तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे