आदमीं हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ खुदा
2122-2122-2122-212 मतला:- ख़ुश ही रहता हूँ शिकायत क्या करूँ क्या है अता।। आदमी हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ ख़ुदा।। हुश्न-ए-मतला:- तेरे ज़ानिब से मुझे जो भी मिला अच्छा लगा । मैं तो मुफ़लिस था मेरी ...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है