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गजल ....चाँद तारों से कभी पूंछा नही

गजल ...चाँद तारो से कभी पूंछा नही Posted by amod bindourion August 18, 2015 at 11:00pmView Blog 0 बहर -2122/2122/2122/212 ---------------------------------------------- आज हम यह सोचते है के बिछड़ कर क्या मिला हाँ ये सच है जो मिला उसका अलग रस्ता मिला ----------------------------------------------- सोचता हूँ चाँद तारों से ज़रा मै...

ह्रदय भाव....

क्यों किसी शैली में बांध कर पोटली बनाऊ तुझे.... तू तो ह्रदय शीतलता का पर्याय है क्यों सर का भार बनाऊ तुझे..... तू मन भावना को भ्रमड करता सजीव है तू संघर्ष का खिलाडी विजेता ह्रदय ह...

एक दिल्ली बिल्ली

लिखा दिल्ली पे करता है पहुच बिल्ली पर जाता है सुना करता हु आलोचक से अक्शर अपने बारे में......... सोंचता हूँ कभी ऐसा भी हो जाये मेरे संग शुरू दिल से करू प्रशंग पहुच दिल्ली तक जाए जो.... ...