सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई..
2121-212-2121-212 सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई।। ख़ैरख्वाह वो बने,खैर-ख्वाही' की गई।। मुद्दतों के बाद गर जो यूँ बात की गई।। खामियां जता के ही गात फिर भरी गई।। गर दो'-आब की पवन,रोंक लें ये खि...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है