सच की झूठी जिल्दकारी क्या कहूँ


याद आती है तुम्हारी क्या कहूँ ।
छाई रहती है खुमारी  क्या कहूँ।

अब नहीं चलता , मेरे पे बस मेरा।
  बढ़ रही नित बेक़रारी क्या कहूँ।।

खुद मुआफ़िक आयत ए कुरआन हो।
इसमें अच्छी अर्श कारी क्या कहूँ।।

झूठा' सिक्का अब चलन बाजार का
सच की झूठी जिल्दकारी क्या कहूँ।।

  हर्ज़ कोई बात से मुझको नहीं।
तुम लगा लो  रहगुजारी क्या कहूँ।।

हाल ख़स्ता चाल बरहम हो गयी।
ज़ीस्त की ईमानदारी क्या कहूँ।।

बद से बदतर हालते सूरत में हूँ।
हाँ गई थी अक़्ल मारी क्या कहूँ।।

अब न चल सकता हवा के साथ मैं।
मानता हूँ खुद ही हारी क्या करूँ।।

इक किताबी कब्र मेरी चाह है।
कर रहा खुद की तयारी क्या कहूँ।।
आमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित

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