दो गजलें
बहर 122/122/122/122 निगाहे नशा बेख़बर देखते है/ तुम्हे आज कल आँख भर देखते है// तुम्हारी अदा से जिधर देखते है/ मुहब्बत का अपने नगर देखते है// रूमानी है आबो हवा यार तेरी/ भरी बज्म में भी हुनर देख...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है