दो गजलें

बहर 122/122/122/122

निगाहे नशा बेख़बर देखते है/
तुम्हे आज कल आँख भर देखते है//

तुम्हारी अदा से जिधर देखते है/
मुहब्बत का अपने नगर देखते है//

रूमानी है आबो हवा यार तेरी/
भरी बज्म में भी हुनर देखते है//

जो सीखें हैं पेंचों के हमने करीने/
चलो आज उनका असर देखते है//

तुम्ही गांव हो ओ गालियाँ हमारी/
तुम्ही से ये सारा बसर देखते है//

दूसरी गजल

बिटिया को अपनी अगर देखते है/
खुदा का करम अपने घर देखते है//

वो नीली परी है खिलौना है घर का//
उसे जब भी देखूँ समर देखते है//

जो सज धज के बेटी की डोली उठी तो//
पड़ोसी भी भर के नजर देखते है//

अभी तक पिता की दुआ का असर था/
ये बेटे तो अक्सर ही जर देखते है//

वो पुरखों ने सींचा कभी प्यार से जो/
वही आज सूखा शजर  देखते हैं

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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