आज खुद को आज कहकर जानता है ।
2122-2122-2122 आज खुद को आज कहकर जानता है।। हल वो बूढ़ा सा शज़र ,पर जानता है।। किसका कितना पेट भूखा रह गया अब । घर का चूल्हा ही ये बेहतर जानता है ।। कैसा बीता है शरद और ग्रीष्म बरखा। मुझसे बेह...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है