क्या यही वक्त है

मैं उँगलियाँ पकडे हूँ ..
वो खिंच रहा है ..
वो तेज  चल रहा है
घसीट रहा है ....
ये इसको देखो , ये  उसको समझो
थोड़ा तेज चलो , बोल रहा है ...
न सुख है , न दुःख है
न  हर्ष है ...न प्यास है
न भूख है , न लालसा
न आस ..चल रहा है तो
बस सन्नाटा....
जल्दी है ....अंजान पते की ..
मुझको नहीं है ,पर उसको मंजिल पता है
ये न मेरा दोस्त है , न दुश्मन है
न मेरा पिता है , न मेरी माता है
कुछ रोकता भी नहीं ..
कभी डांटता भी नहीं ...
कुछ समझाता भी नहीं ...
बस बता रहा है ....
मैं क्या करता हूँ ...देखता भी नही
मेरा गलत को सही भी नहीं करता
बस बढे जा रहा है
बस बढे जा रहा है
क्या यही वक्त है ?????
.........अमोद बिन्दौरी

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