था बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बेहतर है।
बह्र- 2122-2122-2122-22 है बहुत कहने को लेकिन अब तो चुप बहतर है।। जो समझ पाए न तुम क्या फायदा कहकर है।। शोर कितना ही मचाये, या करे अब बकझक। मैं समझ लेता हूँ मेरा दिल भी इक दफ्तर है।। खुश नशीबी ...
जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है