आज खुद को आज कहकर जानता है ।


2122-2122-2122

आज खुद को आज कहकर जानता है।।
हल वो बूढ़ा सा शज़र ,पर जानता है।।

किसका कितना पेट भूखा रह गया अब ।
घर का चूल्हा ही ये बेहतर जानता है ।।

कैसा बीता है शरद और ग्रीष्म बरखा।
मुझसे बेहतर घर का छप्पर जानता हैं।।

कैसे कटती हैं मेरी तन्हा सी रातें ।
खाट  तकिया और बिस्तर जानता है।।

दर्द के किस दौर से गुजरा हुआ मैं।
आह का निकला ही  अक्षर जानता है।।

आमोद बिंदौरी , मौलिक अप्रकाशित

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