दस्तूर
कविता
अजीब समन्दर है ये
यहाँ तो मछली ही
मछली को खा रही है!!!!!!!
इस परिवेश में
मैं भी खुद को बचाता हूँ
और
दूसरों को खा जाता हूँ!!!!!!
क्या करूँ?????
रास्ता सुझाना
बदलाव* है//
वक्त लगेगा/
तख्ता पलट होने में..
तब तक..
यही दस्तूर है/
इस अथाह./शांत/ समन्दर का..
आमोद बिन्दौरी
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