ये कश्ती मेरे जीवन की

कविता

ये कश्ती मेरे जीवन की
क्यों डूब -डूब सी जाती है...
मैं बाँध -बाँध के आता हूँ
वो छूट -छूट सी जाती है.....

हैं नाटक बड़े अजीबों इसके
न समझूँ तो समझती है..
जीवन का हर क्षण गिन लेती है
फिर पास बैठ इतराती है....

जो गम से बोझिल हो नज़रें
तो हजज तमाम सुनाती है..
वो देख देख मेरे चेहरे को
परियों की तरह मुस्काती है.....

रिश्तों में प्यार के तेरे कभी
कम न पड़े मिठास रहे...
इसी लिए मधु मक्खी बन
खुशियों का मधु भर जाती है...

मैं जाति धर्म का विरोधी हूँ
जल जाता हूँ इन बातों से...
वो ज्ञान समन्दर अब्र सा ले
आखिर मुझ पर बरसाती है...

ये कश्ती मेरे जीवन की
क्यों डूब -डूब सी जाती है...
मैं बाँध -बाँध के आता हूँ
वो छूट -छूट सी जाती है.....

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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