कोई उम्मीद का सूरज कहीं पर है खड़ा सायद


जो नजरें अब तलक बेख़ौफ़ दौड़ी जा रहीं हैं यूँ।।
कई आशाएं तपती रेत को खंघला रहीं हैं यूँ।।

कोई उम्मीद का सूरज , कहीं पर है खड़ा सायद।
पहल की  किरने ये पैग़ाम लेकर आ रहीं हैं यूँ।।

ये सन्नाटा जो पसरा चीख़ के कुछ अंश बांकी हैं।
दिशाएँ इंतक़ाम-ए-जंग को दुहरा रहीं हैं यूँ।।

विषमता में खड़ी हो लोकधर्मी जंग लड़कर अब।
  रिसाल ए रौशनाई हौसले उमड़ा रहीं हैं यूँ।।

कोई तो लिख रहा बेशक नया भारत किताबों में।
यक़ीनन आँधियाँ भी सज संवरकर गा रही हैं यूँ।

आमोद बिंदौरी/ मौलिक अप्रकाशित

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