सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई..


2121-212-2121-212

सुब्ह शाम की तरह अब ये रात भी गई।।
ख़ैरख्वाह वो बने,खैर-ख्वाही' की गई।।

मुद्दतों के बाद  गर जो यूँ बात की गई।।
खामियां जता के ही गात फिर भरी गई।।

गर दो'-आब की पवन,रोंक लें ये खिड़कियां ।
  रूह चंद दिवारों के दरमियाँ सिली गई।।

गर कहूँ जो' उनकी' तो साफ़ लफ़्ज हैं यही।
रात-ओ-दिन युँ आदतन हमसे बात की गई ।।

बिन पढ़े किताब -ए- दिल ,ग़र हिंसाब कर दिया ।।
तो दरख़्ती' जिंदगी क़त्ल ही तो की गई।।

मैं गरीब ए आह हूँ , गर कहूँ तो क्या कहूँ।
के तबाह जिंदगी कर के दिल्लगी गई।।

हम  नशे में डूब कर जिंदगी गुजार दें।
उनको ,बे इरादतन ही शराब पी गई।।

आमोद बिंदौरी / मौलिक

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