मन की' मनमानी को ठुकराने लगे हैं
वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।
मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।
अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)
जिस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।
उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।
श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।
बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।
पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।
मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।
सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा, काटें)
आंवा'* जब तपकर किये स्वभाव मटका।(कुम्हार की भट्ठी)
हर तपिश से ..शुक्रिया पाने लगे हैं।।
झूठ के आगे बढा जब सच का चहरा।
कुछ सियासी लोग गुरर्राने लगे हैं।।
लीक से हटकर जरा चलना जो चाहा।
बे-हया हूँ ..... बज्म से तानें लगे हैं।।
सच जरा सा आगे क्या बढ़ने लगा सब।
मरकजों के पैर ....थरर्राने लगे हैं।
अमोद बिंदौरी / मौलिक , अप्रकाशित
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