ह्रदय भाव....

क्यों किसी शैली में
बांध कर
पोटली बनाऊ तुझे....
तू तो ह्रदय शीतलता
का पर्याय है
क्यों सर का
भार बनाऊ तुझे.....
तू मन भावना को
भ्रमड करता
सजीव है
तू संघर्ष का
खिलाडी
विजेता ह्रदय है
क्यों मृत
साहित्य सा
दफ्नाऊ तुझे......
तू हतास न होना
हार कर
तू खेल
अद्भुद खेल
मजे से.......
और
सदा विजई हो........आमोद बिन्दौरी

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