आदमीं हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ खुदा
2122-2122-2122-212
मतला:-
ख़ुश ही रहता हूँ शिकायत क्या करूँ क्या है अता।।
आदमी हूँ ख्वाहिशें होनी नहीं कम ऐ ख़ुदा।।
हुश्न-ए-मतला:-
तेरे ज़ानिब से मुझे जो भी मिला अच्छा लगा ।
मैं तो मुफ़लिस था मेरी हिम्मत कहाँ कुछ माँगता।।
मेरा दम घुटने लगा जब महफिलों की शान में ।
यार आया हूँ उठा कर दूर खुद का मकबरा।।
मेरी मैय्यत में गुलों की बारिशें अच्छी नहीं।
शाइरी के भेष में करने लगा था इल्तिज़ा।।
देख़ो उल्फ़त के सफर ने चैंन ही छीना है बस।
तुम भुला पाओ न पाओ मैं भुलाना चाहता ।।
जैसी चाहे जो भी चाहे लिख मेरी क़िस्मत को तू।
आख़िरत जीता या हारा दो ही सूरत फैसला।।
रौशनाईगार ये कागज़ कलम छूटेगी तब।
नींद का आग़ोश थामें बाँह बोले लौट आ।।
आमोद बिन्दौरी / मौलिक
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें