लौटते कदम

लौटते कदम …
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धुधले होते जा रहे हैं रिस्ते और सपनें

जब कभी लौटा ?तो पाऊँगा सायद! न कभी…

तूने सही कहा था । लौट आओ…
बहारे यही हैं।

वो क्या था …¿¿

जो खीच लाया था और कहीं…
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ये नीम का पेड़ …
आज भी दातून देता है।

ये कुआँ …
आज भी सीतल जल देता है।

कैसे … भटक गयाथा???

ये कैसा नशा था ?
मेरे दिमाक-ए-फितूर का……
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ये वही चौपार है ना
जहाँ चौपाले लगती थी……

ये लकड़ी के खम्भे_
देखो आज भी खड़े है……

कितना अनजान था !!!!!
कितना दूर हो गया था मे अपनी जड़ से…
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मेरे अनदर कोई कवि होता
मै भी जिन्दगी की भँवर का हिस्सा न होता ।

मै फस चुका हू जीवन की मृग तृस्णा पर ।
खो गई है जीवन की कोमला कही पर।
अब तो बस …
लक्छमी …
लक्छमी…का बसेरा दिखाई देता है

10/04/15 आमोद बिंदौरी

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