होड …
मैतो रोज़ फेरे लेता हूँ …
कोई साथ नहीँ बात और है
सुबह का शुरू फेरा
साझ खत्म होता है
मुसाफिर तो खूब मिलते है पूरा दिन
पर रात ……होती है
जब से ये सासे चली…
येधडकन धडकी…
ये आँखे खुली…
ये नब्ज फडकी…
तब से …
इस दिन के…
इन मोसमो के…
इन वर्सो के…
मे फेरे ही तो ले रहा हूँ…
इसी सफ़र मे
कुछ बिछडे…
कुछ जुड़ गए…
कुछ दिख रहे है …
कुछ मिट गए…
कुछ की सम्भना है लौट आने की
कुछ……………………कुछ नहीं
ये फेरे ही तो हैं।???
ये धरती भी अपनी धुरी पर
नित फेरे लगाती है
ये चाँद नित धरती के फेरे लगाता है
सब यही करते है
मे भी यही कर रहा हूँ…
तुम भी…
निर्धारित अवधि है सब की
किसी की ध्रुत है
किसी की मंद
कोई सयमित छेत्र का है
कोई असंयमित छेत्र का
सब लगे है
होड मे …
फेरे लेने की…
आमोद बिंदौरी
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