धूप तेज होती जा रही है
ज़मीन तपती  सी महसूस होती है
अब क्या सावन भी सुखा गुज़र जाएगा
इस मास मे गाँव के पेढो पर झूले हुआ करते थे
गाँवकी सुन्दर सुन्दर सी गोरियाँ
रहटाँ और झूले पर ऐसा मचलती थी जैसे बहारे बागो मे पूरी जवाणी के
आगोश की मदिरा परोस रही हो …
आँखे …
इसका पान करती थी
हृदय मसोसता रहता था
ठीक ऐसे
जैसे
बचपन में किसी तितली के पीछे
घन्टो भागता रहता हूँ
और उसे छू तक न पाया हूँ
बस एक जगह ठहर
आँखो से उसे ऊपर और ऊपर
उड़ते देखते रह जाता था
लौट आता था…
ठीक ऐसा ही आज
आकाश को देख रहा हूँ
की वो अब बूँदे गिराएगा
मन मसोसता है
एक आसरा लिए
ज़मीन खेतो पर दरारो के रूप मे फट रही है
खत्म होता जा रहा है
आसरे मे फँसा किसान…
ये अपने ही हाँथो
अपने आप को खत्म  कर रहा है
पता है इस माह मे …
खेत हरे रंग से रगे होते थे
बीर बहूटी का लाल मखमली रंग
खेत को नई सुन्दर विवाहित
जवान स्त्री के यौवन की तरह
चार चाँद लगाती थी
चार पंखो का कीड़ा
खेतो के ऊपर
हेलीकप्टर की तरह
गोते लगाता था
गंगा जमुना के दो आबे का
हरा भरा तराई छेत्र
हजारो जानवरो को
नव कोपल घास को चर रहे होते थे
मौसम मे एक ठंढक सीतलता लिए
हवा नहीँ दोस्त  मलय बहा करती थी
नित रंग काले हरे रंग का सेड मे
बदलाव होता था
सूरज महीनो तक दिखना बंद हो जाता था
जैसे घर मे नई बहू का आगमन
पर घर के बुजुर्ग
आँगन आना भूल गए हो
और यदि आते है
तो बादलो के तरह गरजते हुए
दुल्हन अदब से चेहरे को ढक
लेती है

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