प्रेम ...दोहा प्रयास

दोहा
बंधन में मत बांधिए ,हर रिश्ते को यार।
प्रेम कभी होता नहीं बंधन से स्वीकार ।
नतमस्तक हो जाएगा यदि होगा स्नेह ।
बहता खून है संग से जैसे जीवित देह ।
तुझसे सब कुछ बोल के ,बैठा हूं चुप चाप।।
सुननी है अब बस मुझे पैरों की पद चाप।।
कितना मुझसे नेह है,और कितना विश्वास।
आती जाती सांस में अब भी है कुछ आस ।

आमोद बिंदौरी 04/08/25

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