मिट्टी से नाता ...क्या बोलूं
मिट्टी से नाता क्या बोलूं
यह देख ..बदन से लिपट गई
अरु की किरणों संग मणियों सा
यह चमक रही है। दमक रही
चंदन सा शीतल तन करती
खुशबू इसकी मन मोहक है
इस पर लेटू तो ममता सी।
इसको चूमू तो पुत्री सी।
माथे को छू ले तो है श्रृंगार
छाती से लगे तो भार्या सी
कैसा अदभुद आनंद मई
संग इसके मेरा जीवन है ।
मिट्टी से नाता क्या बोलूं
यह देख बदन से लिपट गई
दाने दाने से अडिग प्रेम
जो इसमें मिला, संरक्षित है
गीली हो तो यह रूप गढ़े
यदि सूखे तो यह आश्रय है
यदि जनने में आ जाए तो
माणिक,हीरे, सब बच्चे हैं
लाचार और गरीबों से
बड़े बड़े रणधीरों तक
ममता मई इस मिट्टी ने
सबको अपने से मिला लिया
मिट्टी से नाता क्या बोलूं
यह देख ...बदन से लिपट गई
अरु की किरणों संग मणियों सा
यह चमक रही है ..दमक रही
आमोद बिंदौरी
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