दो गजले


212-212-212-212
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
काफ़िया 🍂🍂 आने
रदीफ़ 🍂🍂 लगे

क्यों दिए सब घरों के बुझाने लगे// जख्म खा के नए जख्म खाने लगे//

जिंदगी से हमें कोई शिकवा नहीं//चाहे मिलने में उनसे ज़माने लगे//

जब गए तुम कभी दूर महफ़िल से/
ये अँधेरे मुझे तब डराने लगे//

आज नफरत खुला है मुहब्बत दबी//
आइने चेहरा अपना छुपाने लगे

बज्म से कुछ कहो बज्म तुम से बनी/
बज्म से चाहे कितने ही ताने लगे//

वो सुनहरे परिंदे परिंदे नहीं//
यह समय की लहर हैं घर जाने लगे//

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दूसरी गजल:-

ऐ चिरागों रुको ख़त जलाने लगे//भूल जाने हमको ज़माने लगे//

तेरी यादों के किस्से सुनाने लगे//
कुछ मुसाफिर मुहब्बत बताने लगे//

हौसलो की मिली पूरी कीमत नहीं/जो परिंदों की तरहा उड़ाने लगे//

उनके तरकस में तीरे नजर था वही//
आज कल है जिसे वो चुराने लगे//

जख्म खा के नए जख्म के वास्ते/दिल को अपने नए गुर सिखाने लगे//

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