महफूज अब नही है मुहब्बत के रास्ते


बह्र:-221-2121-1221-212

सौगात अब नही हैं चाहत के रास्ते।।
महफूज भी नही है मुहब्बत  के रास्ते।।

हुस्न-ए -मतला

खाका निंकल रहें हैं सराफत के रास्ते।।
दागे जमीं से अब यह उल्फत के रास्ते।।

शिकवा ये  जिंदगी से रहा उम्र भर मुझे।
क्यों बंद कर दिए थे तेरे ख़त के रास्ते।।

मायूस आदमी की रूमानी लगे सदा।
उल्फत में जब मिले हो रहमत के रास्ते।।

तिनकों की बिनी गात में तारे सजा लिए।
काबिज की हम भी हो लें यूं दौलत के रास्ते।।

तस्बीह खाक लेके जो निकले खुदा कसम।
अदना समझ लिए हमें हसरत के रास्ते।।
तस्बीह- पूजा की माला
अदना- कमजोर ,मामूली
काबिज -अधिकारी
गात -झोली
महफूज- सुरक्षित
खाका -खोखले
दागे -जमीं - अंदरुनी घाव से

आमोद बिन्दौरी
जज़्बात मिटटी'ख़ार हैं चाहत के रास्ते।
महफूज़ अब नहीं हैं मुहब्बत के रास्ते।।

दलदल से हो गए हैं शराफत के रास्ते।
आसान अब कहाँ रहे उल्फ़त के रास्ते।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जीवन पथ पर संशय गढ़कर ,स्वीकार नहीं तुम मुझको प्रिए

अपने दुख को स्वयं निमंत्रण देता हूं

तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे