वो मेरे घर का आँगन
वो मेरे आँगन की
पश्चिमी दीवार
आधी सुनहले रंग से रंगी..
आधी अपने रंग से .....
और नीचे
मेरे स्याही के पेन की छीटे
और मेरी अरबी आयतों की
तरह खीचीं....
आड़ी तिरछी रेखाएं.....
संजोए....
भोर के समय
मनमोहक लगती थी....
खूंटी पर / कपडे की तार पर/
छोटे छोटे आर पर....
वो गौरैयाओं का झुन्ड...
चूं चूं करते
प्रातः ...
फुदकता रहता था.........
दौड़ दौड़ / ठिठक -ठिठक
पकड़ने की कोशिस.....
और उसी आंगन में
महक होती थी...
घर के बने घी.....
बाबा के पूजा अगरबत्ती..
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एक कोने में एक तुलसी का पेड़
जिस पर रोज सुबह
दादी कनेर का
ताजा खिला फूल
और पानी डाल चुकी होती थी....
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एक टब .......जो
घर के पानी की
आवश्यक्ताओं पर
हर सुबह लबा लब
भरा होता था...
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वो मेरे बचपन का
आँगन....
आज मेरी यादों में
धुंधली तस्वीर सा
मेरा
बचपन ले.....
आज भी खिलखिलाता
और चह चहाता है...
और
मुझे मेरे आँगन की
सुनहली पश्चिमी दिवार
सा रंग भर जाता है....
आमोद बिन्दौरी
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