मेरा जुगनू सा सब परिवार होंगे
समय की मार से दो चार होंगे//
मेरे बच्चे तभी तैयार होंगे//
मुहब्बत के खुले बाजार होंगे//
हमारे शेर तब अख़बार होंगे//
न समझो दुश्मनों को काम जवानों/
नकाबों में छिपे ऐय्यार होंगे//
जो मजहब की रही ऐसी ही हालत/
तो सच कहता हूँ हम बीमार होंगे//
लगा की दीप रौशन कर मुहब्बत/
मेरा जुगनू सा सब परिवार होंगे//
वो घूँघट में छिपा कर रुख मिले हैं/
लगा था इश्क में दीदार होंगे//
जरा समझो हयाती इस रिदम को/
तभी ऐ दोस्त सब गुलजार होंगे//
आमोद बिन्दौरी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें