इश्क के दो बोल मीठे ..

इश्क के दो बोल मीठे सुन  न पट जाऊं कहीं।
  बह्र:- 2122-2122-2122-212

होश खोकर मैं न पल्लू में सिमट जाऊं कहीं।।
ना किसी कमसिन के होठों से लिपट  जाऊं कहीं।।

डर रहा हूँ आज अपने उम्र के इस खेल में।
इश्क के दो बोल मीठे सुन न पट जाऊं कहीं।।

वादियाँ कमसिन नशीली छेड़ती अब जिस्म को ।
इसलिए ठिठरन कदम में ना रपट जाऊं कहीं।।

इक समंदर चाहता हूँ प्यास से झुलसा हुआ।
मैं समंदर बावला ले बस उलट जाऊं कहीं।।

  जिंदगी के पथ में मेरा एक ही आमोद  है।
मैं श्रजन करते हुये ही बस निपट जाऊं कहीं।।

आमोद बिंदौरी /मौलिक अप्रकाशित
Srivastavaamod.blogspot.com

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