जीवन संघर्ष

कभी कभी ये समाज में
मैं पल पल
मरता दिखाई देता हूँ
घुटन होती है इस
झूठ और सच की

हिंसा से.....
और मन
अहिंसा वादी बन
सोच बैठता है
क्यों न कोई नयी
दुनियाँ ढूंढ लू
कोई नया ग्रह
जहाँ शांति हो......
सहसा
अंतर मन द्वन्द की
दो रह में 
कायरता को छोड़
नया मार्ग 
ढूंढ लेता है.....
कहता है
तू संघर्ष कर
ये दैव रूप मिली
लेखनी के शस्त्र से
खंडित कर दे......
और निर्माण कर
नए बिश्व का
तू उठ
और उठा
शस्त्र.......
और पहुँच रण में
एक योद्धा की तरह.....
और
जीवन संघर्ष की लिख दे
एक अमिट कहानी
संघर्ष की कहानी.......
आमोद बिन्दौरी

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