मुक्तक


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सभ्यता तो लपेट दो गालियों के किरदार में।
           नग्न लगती है ये अपने व्यवहार में।।
जरूरी नहीं बज्म मे ये शमशीर चले।
        सुई भी दर्द देती है अपने आभार में।।
आमोद बिंदौरी

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