जीवन के उतार चढ़ाव भरे सफर में अलग अलग अनुभव प्राप्त हुए। ध्यान से देखने की कोशिस की तो सब कुछ एक लयबद्य लगा। संजोया तो कविता , गजल बनकर कागज़ पर उभर आया। .जीवन का सफर है चलता रहेगा . कोई खोज सायद अधूरी है
टूटा दिल0
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गम का कोई अंदाज हो तो बताइए
माप परिमाप हो तो बताइए..
मैं भी टूटे दिल के टुकड़े ढक लूँ,
कोई लिबाज़ हो तो बताइए....
आमोद बिन्दौरी
पशु के समान बंधक बनकर स्वीकार नहीं तुम–मुझको प्रिए.. जीवन पथ पर संशय गढ़कर स्वीकार नहीं तुम मुझको प्रिए... बहती नदिया की स्वतंत्र धार कल कल करते यदि आना है तो स्वागत है... जीवन में मेरे तुम्हें प्रेम लिए बाहें खोले यदि आना है तो स्वागत है ... पशु के समान बंधक बनकर स्वीकार नहीं तुम–मुझको प्रिए.. मै सरल ,लचीला, भाव भरा इक द्रवित हृदय का स्वामी हूं विश्वास,प्रेम ,स्नेह से पोषित रंग सुनहला धानी हूं ... बचा हुआ जोभी पथ है गर हाथ पकड़ कर निभा सको जीवन पथ की पगडंडी पर यदि गिरता हूं तो उठा सको कलुष,कुपित , मन अधभर स्वीकार नहीं तुम मुझको प्रिए... मै कृषक के घर में जन्मा हूं मिट्टी से रखता नाता हूं मै कुम्हार की मेहनत पर जो धधक सके वो आंवा हूं श्रृंगार तुम्हीं से है मेरा गर छमता है श्रृंगार करो तुम बढ़ो तुम्हारा स्वागत हृदय बसों विस्तार करो तृष्णा तो केवल तृष्णा है सूखी तृष्णा गर मिटा सको मै चाक की गीली मिट्टी सा तुम मूर्तिकार आकार भरो.. विचलित ,विवश,शक्ति विहीन स्वीकार नहीं तुम मुझको प्रिए... जीवन पथ पर संश...
अपने दुख को स्वयं निमंत्रण देता हूं। मै पथ को फिर शूल आमंत्रण देता हूं। पीड़ाओं की पुनरावृतियां होने से विपदाओं की आवृत्तियां होने से साहस, धैर्य की खुद ही परीक्षा लेता हूं। अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं ...1 कमसिन आंखों वाली गोरी से हो जाए फिर इश्क अफीमी छोरी से मुझमें हो वो मादक महुए के जैसी फिर बिरहा मझधारों ,नइया खेता हूं अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...2 दोस्त–दोस्त का खेल नहीं अच्छा होता दोस्त हो दुश्मन खेल वही अच्छा होता सारे अपने राज खुला कर देता हूं। अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...3 मुझको अति विश्वास मेरे संघर्षों पर छैनी के सिर चोंट किए हथौड़ों पर मै उसको फिर पूर्ण स्वतंत्रता देता हूं अपने दुःख को स्वयं निमंत्रण देता हूं...4 आमोद बिंदौरी
सांस की जब सरगम बदले और आंख बिना मतलब रो ले हम दोनों की बात हो जाए बिन चमड़े की जुबां डोले तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–1 नंगे पैरों तपती धरती का पथ शीतल नम्र लगे हाथ अगर हो हाथों में तो सागर पर्वत क्षम्य लगे तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–2 विपदाएं आएं जीवन में रच कर के कितने ही रंग कहां अकेले भिड़े पड़े हो जब तुम बोलो बैठो संग …तब मानूंगा ....प्रेम है तुमसे–3 पारिवारिक परिचय यदि हो तो नाम तुम्हारे बाद आए सांसारिक जीवन की गति में सदा तुम्हारी याद आए …तब मानूंगा …प्रेम है तुमसे–4 कहने को ,कुछ भी कह दूं अंतिम निष्कर्ष तुम्हारा हो संकल्प कोई करने बैठूं यदि तेरे हाथ जल धारा हो …तब मानूंगा …प्रेम है तुमसे –5 आमोद बिंदौरी 21/07/25
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