नदियों से सीख रख्खा है बहने का इक हुनर


फूलों के साथ हों या काँटों के साथ हम।।
जैसे भी हो जहां भी कुछ ढल गए युं ग़म।।

क्या साथ जायेगा कभी सोंचता हुँ जो।
क्यों पाल के रखा है इतने  ये सब भरम।।

समझो इसे न खेल ग़र लग गया है दिल !
कितना भी कुछ भी कर ले होंगे नए सितम।।

ओह्दे चराग़ जैसा रखता हुँ अब ज़िगर।
सर पाए न उठा हवा या तले का तम।।

नदियों से सीख रख्खा है बहने का' इक हुनर।
इनको न कोई हर्ष इनकी न आँख नम।।

आमोद बिंदौरी

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