तंदूर की भठठी…

तन्दूर की भठ्ठी…10/05/2015

भारत ने 21वीं सदी  की विकास डोर ज़रूर थाम्भ ली थी राज नैतिक  स्थितिया और स्त्री विकास की गति विधि तेज थी। कई महिला अई पी एस भी हुईं ।संसद छेत्र भी आजमाया पर

आज भी यहाँ की मध्यम वर्ग की महिला चाहे वो बिटिया हो,बहू हो की स्थित "तंदूर भठ्ठी की दीवार से चिपकी रोटी" के समान थी।

हम विकास की परम्परा को गतिशील कर रहे थे।पर मध्यम वर्ग की स्तियाँ रोज़ समाचार पत्र, चलचित्र समाचार, पर शुर्खियों पर रहती थी।समाचार पत्र का वक्ता … इनके चीर हरण ,चील हरण,की कहानी को सुन्दर सम्वाद के साथ… गर्व भरे शब्द से …उच्चारित कर रहा होता था।
लोगो को यह किस्से सुबह सुबह… एक कफ चाय के साथ … गरमा गर्म परोसने का रिवाज़ हावी था।ये सिलसिला बस दो दिन …तीसरे दिन नई कहानी ना …पुलिस भी सान्त और न्यायालय  नपुन्सक …
सबूत लाओ?…यहाँ जाओ…वहाँ जाओ…फिर भूल जाओ।।।।।।।

मैं अपने सब्दो में बिन्दौरी कह दूँ तो वह एक समाचार होता था।सुबह का नित्य कर्म था। अंधी समाज एक कान से सुन दूसरे से निकाल देती थी।पता है समाज यह भूल रही थी कि जो आग आज उन्हे एक चिन्गारी लग रही है।यह क्या कर जाएगी …

बेटी+, बहू, +बहन =… स्त्री    (रोटी) और समाज आग थी और जिससे यह स्त्री चिपकी थी वो या तो मायका था या फिर ससुराल …
यह स्थित तब तक बनी रहती थी।जब तक रोटी पकने वाला उसे एक नुकीली छड से भेद बाहर नहीँ निकाल लेता था…

पहले तो गर्भ मे ही सल्टा दिया जाता था।
कुछ औसधि के धन्वंतरि कुछ कौडी ले ख़ुशी ख़ुशी यह कर देते थे।

बिंदौरी  मैने सुना है ममता होती थी ??

हाँ यार ममता तो होती है पर उन लोगो के पास कपाट बंद होती थी।
फिर…
फिर कुछ बड़ी हुई तो समाज के कुछ कुत्ते नोचने खाने की और समाचार पत्र की सुर्खिया बनवाने में सहयोग कर देते थे।
क्या घर के लोग कुछ नहीँ करते थे??

मैने पहले बताया ये मध्यम वर्ग था। कानून नपुंसक था
फिर …
कुछ बड़ी हुई तो  दहेज की आग लग जाती थी…
यहाँ ही गो मुख था तंदूर की भठ्ठी की आग का…
इसके बाद माँ बाप भी पल्ला झाड़ लेते थे और ससुराल …
वोतो पहले ही एक लम्बी रक़म लेके घर घुसने देतें थे।
अब बस घर की तंदूरी तपती दीवाल और समाज की धधकती आग……

बिंदौरी मे तो नि:सब्द हो गया

हाँ मे भी अब कुछ नहीँ कह सकता

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