दोस्त …

दोस्त…

बिल्कुल वैसा का वैसा है
मेरा दोस्त अभी तक वैसा है
जिसे भूल गया था मे कब का
वो प्यार अभी तक वैसा है…

अब भी उसके जिस्म में
मेरी चाहत की ही साँसे हैं
आँखो मे उसके दरिया हैं
लब भी उसके प्यासे हैं…

मुझसे नही ओ बिंदौरी
खुदा से उसकी लड़ाई है
क्यों प्यार में छोड़ा था उसे
ये उल्झन अब मेरे पास आई है…

जगता हूँ अब मैं रातोऔ में
उसकी यादों की आबों में
मैं रेत का एक ढेर सही
उड़ बैठा था जज्बातों में…

वो पत्थर थी बंध समाज लिए
उस बंध को उसने तोड़ा है
मैं कायल हूँ  प्रगतिवाद लिए
प्यार के बंधन को मैंने  तोड़ा है…

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